(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.282. अध्यायः 282
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति तृष्णात्यागस्य सुखसाधनताप्रतिपादकजनकमाण्डव्यसंवादानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-282-0x(6358)(76552)
भ्रातरः पितरः पौत्रा ज्ञातयः सुहृदः सुताः।
अर्थहेतोर्हताः क्रूरैरस्माभिः पापबुद्धिभिः॥ 12-282-1(76553)
येयमर्थोद्भवा तृष्णा कथमेतां पितामह।
निवर्तयेयं पापानि तृष्णया कारिता वयम्॥ 12-282-2(76554)
भीष्म उवाच। 12-282-3x(6359)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
गीतं विदेहराजेन माण्डव्यायानुपृच्छते॥ 12-282-3(76555)
सुसुखं बत जीवामि यस्य मे नास्ति किंचन।
मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन॥ 12-282-4(76556)
अर्थाः खलु समृद्धा हि गाढं दुःखं विजानताम्।
असमृद्धास्त्वपि सदा मोहयन्त्यविचक्षणान्॥ 12-282-5(76557)
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम्॥ 12-282-6(76558)
यथैव शृङ्गं गोः काले वर्धमानस्य वर्धते।
तथैव तृष्णा वित्तेन वर्धमानेन वर्धते॥ 12-282-7(76559)
किंचिदेव ममत्वेन यदा भवति कल्पितम्।
तदेव परितापाय नाशे संपद्यते पुनः॥ 12-282-8(76560)
न कामाननुरुध्येत दुःखं कामेषु वै रतिः।
प्राप्यार्थमुपयुञ्जीत धर्मं कामान्विवर्जयेत्॥ 12-282-9(76561)
विद्वान्सर्वेषु भूतेषु व्याघ्रमांसोपमो भवेत्।
कृतकृत्यो विशुद्धात्मा सर्वं ज्यजति वै स्वयम्॥ 12-282-10(76562)
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा शोकानन्दौ प्रियाप्रिये।
भयाभये च संत्यज्य भव शान्तो निरामयः॥ 12-282-11(76563)
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः।
योसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखं॥ 12-282-12(76564)
चारित्रमात्मनः पश्यंश्चन्द्रशुद्धमनामयम्।
धर्मात्मा लभते कीर्ति प्रेत्य चेह यथासुखम्॥ 12-282-13(76565)
राज्ञस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रीतिमानभवद्द्विजः।
पूजयित्वा च तद्वाक्यं माण्डव्यो मोक्षमाश्रितः॥ ॥ 12-282-14(76566)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि द्व्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 282॥


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